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यह विचारधारा राष्ट्र की एकता, संप्रभुता और विकास को व्यक्तिगत या सामूहिक हितों से ऊपर रखती है। राष्ट्र सर्वोपरी भावना का तात्पर्य है कि देश की सुरक्षा, प्रगति और समृद्धि को सर्वोपरि मानते हुए हर नागरिक तथा संस्था को उसी के अनुरूप कार्य करना चाहिए। इसमें जाति, धर्म, भाषा जैसे विभाजनकारी तत्वों से ऊपर उठकर समग्र राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखना शामिल है।

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बुधवार, 19 नवंबर 2025

"संगठन का गीत"

 "संगठन का गीत"


हिन्दू स्वाभिमान की मशाल हो तुम हिन्दू जीवन की आधारशिला हो तुम संघटित होकर के निज बल दिखलाओ भारत माता को सिर झुकाओ

जय जय सूर्य समीरजलधर जय जय धरती धरा गगन मंडल जय जय भारत भाग्य विधाता तुझको कोटि कोटि प्रणाम हमारा

चल पड़े हैं हम विजय पथ पर होके अडिग अटल अविचल निश्चय लेकर हिन्दू समाज को संघटित कर हिन्दू राष्ट्र को सुदृढ़ बनाकर

भारत माता की जय ! भारत माता की जय !



संघ का गीत (रचनाकार: श्री नारायणराव मुक्तिबोध ‘बालासाहेब’ देशपांडे)

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